अकेला मनुष्य

मिथलेश शरण चौबे
 साभार  जनसत्ता - रविवारी , 23  अक्टूबर 2011 में प्रकाशित
सामाजिक धार्मिक राजनैतिक
प्राणी रहते हुए मनुष्य
आर्थिक भौगोलिक जैविक दार्शनिक
प्राणी भी रहता रहा
बहुत सारे और भी प्राणी हुआ वह
अकेला मनुष्य
बहुत पहले नहीं रहा
बहुत पहले उसने अपने
स्वतंत्र मनुष्य होने की
एकमात्र शाश्वत आकांक्षा
लगभग खो दी



कुछ समय पहले
बिना किसी चमत्कार के
घटित हुआ यूं कि
अन्ना हजारे नाम हुआ एक मनुष्य का
हमारे अपने नाम से ज्यादा आकर्षक
और काम से लाख गुना
ज्यादा सार्थक

ज्यादा सार्थक काम में अपने हाथ बंटाने
बहुत सारी परिभाषाओं से लदे
बहुत सारे मनुष्य आगे आये
आगे आये मनुष्य
अकेले मनुष्य नहीं थे इस बात का
ध्यान नहीं रहा उन्हें
उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहा कि
यदि वे एक मनुष्य अन्ना के पक्ष में
कहेंगे कुछ तो वे
मनुष्य होने से थोड़ा
और दूर चले जायेंगे

हालांकि अबकि वे
भाजपा माकपा भाकपा तेदेपा
आदि हो सकते हैं
वे हो तो सकते हैं आरएसएस के एजेंट भी
बस दो वाक्य सत्ताधारी पार्टी के
खिलाफ बोलना ही तो हैं

लोग, जनता, रियाया, आवाम, मनुष्य
इन सभी शब्दों से
लगातार एक पीड़ा झलकती रहती है
यदि ये सभी कांग्रेस भाजपा बसपा
राजद लोजपा तेदपा माकपा
भाकपा द्रमुक अन्नाद्रमुक तृणमूल
शिवसेना अकाली आदि में
तब्दील हो जाएं तो
विलुप्त हो जायेंगी पीड़ाओं से
खदबदाती सारी दुखों की नदियां

कोई मनुष्य मात्र नहीं बचा
सबसे अचूक नुस्खा है
मनुष्य को दुख से उबारने का

अबकि यदि बच गए हों
धोखे से कुछ अकेले मनुष्य मात्र
तो वे भी आखिर करेंगे क्या

रात में अक्सर एक सपना आता है
एक अधनंगा आदमी चश्मा पहने
लाठी टेकते तेजी से जा रहा है
और आश्चर्य यह कि उसके पीछे
असंख्य अकेले मनुष्य मात्र
जा रहे हैं|

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