माइक्रोफाइनेंस कम्पनियों पर सरकारी नकेल

''गरीबी'' के विरूद्ध संघर्ष के एक विचार का प्रयोग अपने उन्नति काल में ही अचानक संकट में फंस गया है। यह संकट है लघु वित्त (माइक्रोफाइनेंस) कंपनियों का। चिन्ताजनक यह है कि देश का जो राज्य आंध्रप्रदेश माइक्रोफाइनेंस के क्षेत्र में अगुआ होने का गौरव हासिल किए हुए था,
संकट का उदय वहीं से हुआ है। आजकल जिस वित्तीय समावेशन (फाइनेंशियल इन्क्लूजन) की नीतियों को अपनाने की जोरदार सिफारिश की जा रही है, उसी का प्रयोग लघु वित्त कम समय में ही संकट में फँस गया है।
वित्तीय समावेशन की अवधारणा में यह माना जाता है कि यदि देश का वित्तीय तंत्र आम आदमी खासकर गरीब वर्ग तक पहुंच सके तो गरीबी के दुष्चक्र से बचा जा सकता है। 
इस विचार के पीछे गरीबों को साहूकारों के चंगुल से बचाने के साथ एक संगठित एवं न्यायोचित वित्तीय व्यवस्था को खड़ा करना था। चूँकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और इसके बाद ग्रामीण बैंकों के द्वारा भी यह लक्ष्य अपेक्षित स्तर पर नहीं सध रहा था, इसलिए स्व-सहायता समूह ;ैभ्ळद्ध तथा माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं का उदय हुआ। 
स्व-सहायता समूहों की व्यवस्था आर्थिक गतिविधियों के लिए समूहों के गठन के पश्चात्‌ विभिन्न स्तरों पर सफलतापूर्वक चलने पर ही सार्वजनिक बैंकों से वित्तीय सहायता और अनुदान प्राप्त करने वाली है और यही कारण है कि इससे वित्तीय समावेशन का लक्ष्य सीमित मात्रा में ही पूरा हो सका है और इसी ने लघु वित्त संस्थाओं की नींव रखी।
देश में लघु वित्त संस्थाओं की प्रगति के अल्पावधि में ही जो उत्साहजनक आँकड़े आए, उनसे देश में लघु वित्त की अनुमानित २,४०,००० करोड  रूपये की माँग को पूरा करने की दिशा में आशा बंधी। वर्ष २००४-२००९ के बीच ९१ प्रतिशत की वार्षिक दर से ऋण धारकों और १०७ प्रतिशत की दर से ऋण वितरण में वृद्धि से आज लघु वित्तीय संस्थाओं से लगभग २.२० करोड  गरीब और छोटे व्यवसायी लाभ उठा रहे हैं। यहाँ यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि देश में इन संस्थाओं का समरूप विकास नहीं हुआ। 
३ राज्यों आंध्रप्रदेश, तमिलनाडू और कर्नाटक में कुल लघु वित्त वितरण का लगभग ६० प्रतिशत और केवल कर्नाटक में एक तिहाई भाग का वितरण यह दर्शाता है कि देश में माइक्रोफाइनेंस के क्षेत्र में आंध्रप्रदेश ने तेज प्रगति की और इन कम्पनियों ने अपनी इक्विटी पर २० से ३० प्रतिशत के प्रतिफल के साथ सफलता के नए झंडे गाड  दिए। 
गरीबों को घर-घर तक अपने एजेंटों के माध्यम से लघु वित्त की आवश्यकताओं को पूरा करने के कारण कम समय में ही अधिक प्रचलित हुई इन कम्पनियों में से एक 'एस.के.एस.' ने जब शेयर बाजार से अपने पहले प्रारंभिक सार्वजनिक निर्गम (आई.पी.ओ.) से १५०० करोड  रू. उगाए, तब इस क्षेत्र ने वित्तीय बाजार में मजबूती से पैर जमाने का प्रमाण प्रस्तुत किया था, परन्तु आंध्रप्रदेश की ताजा घटनाओं से इस क्षेत्र की प्रगति में अचानक ब्रेक लग गया।
आंध्रप्रदेश सरकार ने १५ अक्टूबर से ''लघु वित्त संसाधन'' (कर्ज नियमन) अध्यादेश २०१० के माध्यम से इन कंपनियों पर नकेल कसने का निर्णय लिया। ऐसा इन कंपनियों की ऊँची ब्याजदर और साप्ताहिक वसूली के दमनकारी तौर-तरीकों के कारण लगातार सामने आई आत्महत्याओं के प्रकरणों के कारण उठाया। ये कम्पनियां सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से अपनी पूंजी का लगभग ८० प्रतिशत भाग ९-१४ प्रतिशत ब्याज पर उठाकर ३२-४२ प्रतिशत पर गरीब जनता को बांट रही थीं और इसी के दबाव में आत्महत्याओं का दौर आरंभ हुआ।
केंद्र सरकार ने इसे २०-२४ प्रतिशत तक लाने का दबाव बनाया है और इसके लिए एक समिति भी गठित की है। बैंकों ने भी इन कर्जों की जोखिम को देखते हुए इन्हें वित्त उपलब्ध कराने में हाथ सिकोड़ना चालू कर दिए हैं। वर्ष २००७ में जहां २४५६ करोड  रूपये इन कम्पनियों के खातादारों के बकाया थे, जो वर्ष २००९ में बढ कर ११७३४ करोड  रूपये हो गए। फिर सरकारी हस्तक्षेप से उधारी की वसूली की दर भी कम हो गई और यह क्षेत्र चारों ओर से संकट में घिर गया। यद्यपि इन कंपनियों की बैंकों से चल रही बातचीत से कुछ हल निकलने की आशा की गई है परंतु मूल प्रश्न गरीबी उन्मूलन के एक और उपाय के असफल होने के संकट का है, जिस पर व्यापक विचार किया जाना चाहिए।
    आंध्रप्रदेश की घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में यह उचित है कि राज्य सरकार और कंेंद्र सरकार ने इस क्षेत्र के नियमन की ओर ध्यान दिया है परंतु आर्थिक सुधारों के संदर्भ में यह एक विचित्र बात है कि जब सरकारी नियंत्रण की अधिकता होती है, तब विकास अवरूद्ध होता है और जब निजीकरण की पैरवी की जाती है, तब आर्थिक लाभ के लोभ को रोकना कठिन हो जाता है, चाहे वे योजनाएं गरीबों के लिए ही क्यों न बनी हों यह प्रश्न भी बड़ा माकूल है कि क्यों व्यक्ति और संस्थाएं आदर्शों का झंडा लेकर स्वार्थों की राह पर निकल पड ते हैं? सरकारी नियंत्रण जहां अवरोधक बनकर भ्रष्टाचार को पोषित करता है तो स्वतंत्रता निर्द्वन्द्व व्यवहार की ओर झुक जाती है। इनके बीच सामंजस्य का प्रश्न आर्थिक विचारों की आज की बड ी चुनौती है। महात्मा गांधी के शिष्य बनवारी लाल चौधरी का होशंगाबाद के पास ग्राम निटाया में जब गांधी के सपनों का गांव बनाने का प्रयत्न असफल हुआ, 
तब मेरे एक पत्र के उत्तर में उन्होंने लिखा ''सरकार की खैराती योजनाओं ने लोगों को बेईमान और अकर्मण्य बना दिया और इस कारण मेरा प्रयोग फेल हो गया।'' चौधरी जी की इस पीड ! में संभवतः वह मर्म छिपा है, जो माइक्रोफाइनेंस जैसे गरीबी उन्मूलन के उपायों के प्रयोग की व्यूह रचना बनाते समय ध्यान में रखना होगी। हमें माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के साथ हितग्राहियों की मानसिकता को भी सम्हालने के दोहरे लक्ष्य को साधना होगा, तभी एक आदर्श वित्तीय समावेशन की नीति का निर्माण हो सकता है।
 जी. एल. पुणताम्बेकर

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