खर्चों से पहले लगे भ्रष्टाचार पर लगाम

केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा खर्चो मे मितिव्ययता लाने के इश्तहारी समाचारों और उन पर रहे विश्लेषणो में जो निष्कर्ष उभर रहे है उनमे इस नौटंकी से परे सरकारी अमले द्वारा सार्वजनिक धन के अपव्यय के पुख्‍ता इंतजाम की आवश्यकता प्रदर्शित करते है। सार्वजनिक जीवन का यह स्थापित आदर्श यूं तो अब कम ही देखने को मिलता हैं परन्तु कभी- कभी जमीनी हकीकतें उन पर लौटने पर मजबूर करती है। केन्द्र तथा राज्यों की राज्यकोषीय मजबूरियो के चलते उठे इस मुददें मे यद्धपि विदेश राज्य मंत्री शशि थरुर अपने बेलगाम वक्तव्यो के कारण खलनायक बनकर उभरे, यह उनके लिये दुर्भाग्य हो सकता है परन्तु इससे दूसरे नेताओ के निर्दोष होने का संदेश नही जाता। इस संबन्ध मे युपीए सुप्रीमो सोनिया गॉधी और युवा ब्रिगेड के अगुवा राहुल गॉधी से जुडें प्रतिकात्मक प्रयत्नों का अपना महत्व हो सकता है परन्तु इतना ही काफी नही है। भारतीय राजनीती मे इस शाश्वत विचार की पुर्नप्रतिष्ठा की आवश्यकता तो है परन्तु विगत वर्षो मे ऐसे अनेक प्रयत्न व्यस्था परिवर्तन मे नाकाम रहे। आज जब जनता राजनितिज्ञों तथा प्रशासन रूपी तंत्र की लुट को रोज खुली आंखो से देख रही है तब इन्ही के मुंह से मितिव्ययता का जाप हास्यपद लगता है परन्तु यदि यह प्रतीकों को वास्तविक्ता मे बदलने का अवसर माना जाय तो इस मुद्‌दे पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। यह विचारणीय है कि जब व्यक्गित जीवन मे हम संकट काल मे स्वतः मितिव्ययी आचरण करते है तब देश की आर्थिक परिस्थितियो और मौजूदा वित्तीय संकट मे सार्वजनिक जीवन मे तो यह अपरिहार्य ही है। चिन्तनीय यह हैं कि इसके नाम पर किये जा रहे स्वांग और उसके विज्ञापनी समाचारो के स्थान पर सार्वजनिक धन की बचत हेतु ठोस पहल होनी चाहिए। ऐसी पहल करते समय न केवल परिस्थितियो का सही विश्लेषण किया जाना चाहिए वरन कालानुसार मितिव्ययता के मापदंण्डो का परिमार्जन भी होना चाहिये। इसके साथ ही मर्ज के मूल कारणों तक पहुंचकर उन पर सटीक व्यूहरचना के साथ निर्णायक प्रहार होना चाहिये।
यदि परिस्थितियो के विश्लेषण और मितिव्ययता के लक्ष्य संधान की बात की जाये तो यह निर्विवादित तथ्य हैं कि स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति पेशे में तब्दील हुई और इसने सार्वजनिक जीवन की तमाम स्थापित मान्यताओं को ध्वंस्त कर दिया। इस पंचवर्षीय पेशे का भरपूर लाभ उठाने और उसमे लगातार पैर जमाये रखने के लिए तंत्र की मदद से जो खेल चला उसमे मितिव्ययता जैसे शब्दो के लिये कोई स्थान नही था। यह वर्ग सार्वजनिक धन को जिस प्रकार अपनी जागीर समझने लगा उससे एम० कृष्णा और शशि थरुर के प्रकरण तो वे नजीरें मात्र है जो प्रकट होने से चर्चा मे आ गयी वरना धन के अपव्यय ही नही, दुरुपयोग के मामले प्रत्येक स्तर पर लगभग रोज ही उजागर होते रहते है। इससे भी खतरनाक यह है कि ऐसे प्रकरणों मे न्यायतंत्र बेअसर है और जनता सुस्त। यही कारण है कि आर्थिक अपराधी बेखौफ है। इस स्थिति मे सरकारी तंत्र की ओर से आया मितिव्ययता का
विचार विज्ञापनी और ‍िशगुफेबाजी लगे तो यह स्वाभाविक है परन्तु परिथितियों पर विलाप करने के स्थान पर इसे एक अवसर मे बदलने का प्रयत्न करना अधिक कारगर होगा। इसके लिए प्रयत्नो की दिशा को कुछ बडे संकटो की ओर मोडना होगा क्योकि यही मर्ज के मूल कारण है। मितिव्ययता आज केन्द्र तथा राज्य सरकारों का नीति निर्धारक तत्व बने, यह राजकोषीय मजबूरी तो है परन्तु राजकोष पर से दबाब धटाने के अधिक कारगर उपाय बेलागाम भ्रष्टाचार पर नियन्त्रण मे है। इस सम्बन्ध मे यह प्रचलित जुमला स्वीकार नही होना चाहिए कि भ्रष्टाचार को रोकना असंभव है या यह समस्या अन्तर्राट्रीय है। इस जुमले की स्वीकार्यता आपराधिक गटबंधन मे भगीदारी या जिम्मेदारी से पलायन इन दोनो ही रुपों मे देखी जानी चाहिये। क्या सरकार व्ययो मे १०ः के स्थान पर भ्रष्टाचार मे १०ः कटौती का संकल्प नही ले सकती? आप कह सकते है कैसे? कुछ उपाय तो बहुत सरल है! सरकार उन योजनोओं पर तत्काल व्यय बंद करे जिसमे घपलेबाजियॉ उजागर हो चुकी है। जैसे हाल मे उजागर महिला बाल विकास की पालन घर योजना ! ऐसी योजनाओ को बन्द कर करोडो रुपयों का अयव्यय रोका जा सकता है ! इसके अतिरिक्त सरकारी खरीद मे सीएजी द्वारा उजागर घोटालों पर तय सीमा में निर्णायक कार्यवाही के साथ सरकारी खरीद की प्रक्रिया में बदलाव करने की भी आवश्यकता है क्योकि यह भ्रष्टाचार का एक अधिकृत रास्ता बन गया है ! इसके अतिरिक्त केद्रीय सतर्कता आयोग और आयकर जैसे विभागों को व्यापक अधिकार के साथ इनकी जवाबदेही तय कर सार्वजनिक धन की बडी बचत की जा सकती है! सरकार को ऐसी र्कायवाही में जब्त राशियों को न्यून्तम समय सीमा में निर्णय कर राजसात करने का कानून बनाकर भारी राजस्व जुटाया जा सकता है ! ऐसा विश्वास है कि केवल इन्ही उपायो से केन्द्र के चालू बजट के ४.५ लाख करोड रुपयो के घाटे का एक बडा भाग पूरा किया जा सकता है! बाकी का लाभ उस संदेश से मिलेगा जो सरकारी सख्‍ती से जाएगा ! आप यह कह सकते है कि बिल्ली के गले में घण्टी बॉधे कौन ? तो यह सच है क्योकि यदि बोफोर्स कांड को बन्द करने का यदि समाचार नही आता तो सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और डॉ० मनमोहन सिंह से कुछ आशा थी! अब तो जनता मे से ही कोई ईमानदार पहल हो तभी कुछ आशा की जा सकती है!
डॉ० जी० एल० पुणताम्बेकर, रीडर वाणिज्य विभाग, डा० हरी सिंह गौर वि० वि० सागर
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नहीं चाहिए सूचना का अधिकार

हमारे एक परिचित गुप्ता जी अखबारों को लगभग चाट कर पढ़ने और तमाम न्यूज चेनलों को चिपककर देखने के शौकीन तो हैं हीं, अपने दोस्तों-परिचितों के घर जाकर इनमें परोसी गई जानकारी को बडी फुरसत से विश्लेषण करने की बीमारी से भी ग्रसित हैं।
दूसरों की व्यस्ता से बेखबर ये सज्जन राष्ट्रीय मुद्‌दों के स्वयंभू विश्लेषक बनने का भ्रम पाले हुए हैं। इन्हें जानने वाले तमाम लोग इनसे पाला पढ ते ही सम्पूर्ण गर्वोक्ति से प्रस्तुत इनके निष्कर्षों से तत्काल सहमति जताकर संभावित बहस को यथासंभव छोटा करने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
लोगों द्वारा आत्मरक्षा में अपनाई गई इस नीति से गुप्ता जी को ये मुगालता हो गया है कि वे किसी विषय पर जो तर्क और निष्कर्ष देते हैं, वे अकाट्‌य होते हैं और शायद इसीलिए उनसे शास्त्रार्थ करने की कोई हिम्मत नहीं करता। जो कोई अभागा इनकी इस बीमारी से अनभिज्ञ होता है, वह इनसे उलझने की गलती कर बैठता है। उसे तो तब होश आता है जब चार-पांच घंटे बर्बाद हो जाते हैं और अन्ततः उनसे सहमति जताए बिना बचने का कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।
हालांकि मैं गुप्ता जी की इस बीमारी से भली-भांति परिचित था परन्तु एक रविवार की सुबह फुरसत में जब वे पधारे तो मैंने उनसे पंगा लेने का मन बनाया। अपनी आदत के अनुसार सोफे में धसने के साथ ही गुप्ता जी एकदम अपने शास्त्रार्थ के मूड में आ गए।
इस बार वे जो मुद्‌दा लाए थे उसमें सरकार की तारीफ की मंशा साफ झलक रही थी, बोले तुमने पढा होगा कि केन्द्रीय मंत्री ने सूचना के अधिकार कानून को और कारगर बनाने का संकल्प लिया है। अब इस कानून से देश में नई क्रांति आयेगी। ऐसा लगता है कि देश में कुछ अच्छा काम भी हो रहा है।
मसलन सूचना का अधिकार कानून, नरेगा और सर्व शिक्षा अभियान जैसे प्रयासों से देश की तस्वीर बदल रही है। सूचना के कानून ने तो सरकारी काम-काज में ऐसी पारदर्शिता लाई है कि अब तो हर कोई यह जानने का अधिकार रखता है कि योजनाएं कैसी चल रही हैं?अब तो न्यायालय भी इस दायरे में आने को तैयार हो रहे हैं।
तुम्हे क्या लगता है? इससे हमारे देश में एक नई क्रांति का आगाज़ नहीं हो रहा है!'' गुप्ता जी इतना कहकर इस अंदाज में सोफे पर फैल गए कि मेरे पास इस मुद्‌दे का समर्थन करने के अलावा कोई चारा होगा ही नहीं परन्तु आज मैं कुछ और ही मूड में था। मैंने कहा, ''गुप्ता जी सूचना के कानून से क्रांति लाने की बात तो दूर इससे तो जनता को भारी नुकसान हो रहा है।'' मैंने बडे लाइट मूड में उनके पाण्डित्य को चुनौती देते हुए उन्हें छेडा। वे लगभग उलझते हुए बोले ''क्या बात करते हो?'' उनके हाव-भाव से ये साफ लग रहा था कि उन्हें बडे दिनों बाद कोई मण्डन मिश्र मिला है।
बोले, इसमें नुकसान कैसा भाई, सरकार जनता के पैसे से चलती है और उसे अगर यह जानने का हक मिला है कि सरकार क्या कर रही है और कैसे कर रही है तो इसी पारदर्शिता से तो सही प्रजातंत्र आयेगा। इस कानून में तो गरीबी रेखा से नीचे वाला बिना दमडी खर्च किए सारी जानकारी ले सकता है। अब सरकार उसे कैसे बरगलाएगी ? अब अगर मंत्री जी इसे और प्रभावी बनाने में सफल हो गए तो तो समझो सरकार की नकेल जनता के हाथ में पूरी तरह आ जायेगी।
मैंने गुप्ता जी के इन कागजी तर्कों को तवज्जो न देते हुए पूंछा ''भाई साहब, आपको पता है आजकल हार्ट और स्ट्रेस के मरीजों की संखया तेजी से क्यों बढ़ रही है? आप इसका कारण जानते हैं? गुप्ता जी भौचक होकर मुझे देखते हुए बोले ''यार यह तो सच है कि आजकल इनके मरीजों की संखया बढ रही है पर इसका सूचना के अधिकार कानून से क्या लेना-देना।'' मैंने कहा है गुप्ता जी है और इसी कानून का नहीं सारी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी इससे सम्बन्ध ही नहीं पूरा का पूरा दोष भी इन्हीं पर है।
इन्हीं के कारण जनता बीमार हो रही है। टेंशन बढ रहे हैं। अरे मुए अखबार और खबरिया चेनल ही रोज-रोज टेंशन वाली खबरे देने को क्या कम थे जो सूचना के अधिकार से मिल रही जानकारी से टेंशन भी पुखता होता जा रहा है। बात समझ में आई कि नहीं, मैंने गुप्ता जी से पूंछा। गुप्ता जी को शायद पहली बार अपने पाडित्य पर शक हो रहा था।
अचानक विषय का मुद्‌दा बदलने से कोई तर्क न सूझने की उलझन के बीच मैंने उन्हें फिर छेडा गुप्ता जी अरे आरूषि काण्ड हो, सबलवाल काण्ड हो, बी.डी.ए. अध्यक्ष की हत्या हो, बोफोर्स चारा घोटाले से लेकर कटनी तक में पकड े गए करोड ों रूपये की बेनामी सम्पत्ति हो, इनके समाचारों से क्या जनता को टेंशन नहीं होता? अब कल्पना करो कि सूचना के अधिकार से इनकी सही जानकारी मिल गई तो कईयों के तो हार्टफेल ही हो जाएगें।
वो भला हो कि अधिकारी सही जानकारी नहीं देते नहीं तो समझो हर ब्लॉक में एक मनोचिकित्सक नियुक्त करना पड ेगा और एक बात और बताए देता हूं कि इसमें ईमानदार और बेईमान सब टेंशन में हैं। बोले कैंसे? गुप्ता जी को कुछ सूझ नहीं रहा था। मैंने समझाया अरे भाई ईमानदार तो देश की इस लूट से टेंशन में होते ही हैं और बेईमान दो तरह के होते हैं। एक वे जो इस लूट में भागीदार होते हैं।
वे इस टेंशन में रहते हैं कि सूचना के अधिकार से पोल न खुल जाए। अगर अधिकारियों की कृपा से बच गए तो दूसरे बेईमान टेंशन में जो इस लूट में मलाई नहीं मार पाए। है न खतरनाक कानून, जनता के हित में इसे मजबूत नहीं समाप्त किया जाना चाहिए। गुप्ता जी अपनी सनातन विद्वता को लगभग लात मारते हुए बड़ी दयनीय मुद्रा में बोले ''फिर क्या किया जाना चाहिए, जनता को कैसे बचाए? मैं अपनी विजयी मुस्कान के साथ बोला ''बडा सिम्पल है।
सूचना का अधिकार कानून तत्काल समाप्त किया जाए। अखबार छपें पर उसमें खबरे नहीं केवल विज्ञापन हों, जरूरी हो तो पन्ना खाली रखा जाए। समाचार चेनलों पर सुन्दर-सुन्दर स्त्रियां खूबसूरत लिबासों में फुल मेकप के साथ दिखाई देतीं रहें पर टी.व्ही. की आवाज केवल विज्ञापन के समय ही खुले।'' गुप्ता जी यही है साल्यूशन जनता को टेंशन फ्री करने का और हाई की बीमारी से बचाने का। अरे इससे सरकार का हेल्थ केयर का खर्च आधा हो जायेगा। मंत्री, संत्री और ठेकेदार सब सुखी और निद्वंद सब तरफ शांति न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। मैं बडी तनमयता के साथ अपनी बात पूरी कर रहा था और मुझे पता ही नहीं चला कि गुप्ता जी कब खिसक लिए और फिर आज तक उनके दीदार नहीं हुए।

डॉ जीएल पुणतांबेकर, डॉ० हरिसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय,सागर मप्रविस्तार से पढ़ें..........

सरकार हड़ताली शिक्षकों की जगह युवा बेरोजगारों को नौकरी दे.

मप्र मे पिछले दो हफ्तों से महाविद्यालयों के शिक्षकों की हड्ताल चली आ रही है। इसमें करीब 7 हजार शिक्षक शामिल हैं। छठवें वेतन मान की मांग को लेकर चल रही इस हड्ताल की वजह से महाविद्यालयों मे पढ़ाई पूरी तरह से ठप्प पड़ी हुई है। हालांकि यह सच भी अब किसी से छुपा नहीं है कि ये शिक्षक इतना अच्छा नहीं पढ़ाते हैं कि जिससे बच्चे अच्छे नंबरों से पास हो सकें।
इस सिलसिले मे आम जनता को यह बताया जाना चाहिए कि हड़ताल कर रहे कॉलेजों के शिक्षकों को हर माह करीब 40 हजार रूपए वेतन मिलता है। वेतन के अलावा ये उत्तर पुस्तिकाओं की जांच कर व परीक्षाओं मे ड्यूटी करके भी पैसा बनाते रहते हें।
लेकिन इनकी पैसे की भूख अभी शांत नहीं हुई है। इन्हें इस बात से कोई लेना देना नहीं है इनकी हड़ताल से जिन विद्यार्थियों की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है उनमे से अधिकांश विद्यार्थियों के मां-बाप महज 1500 से 2000 रूपए मे परिवार चलाकर मुश्किल से बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठा पा रहे हें। क्या वे जीवन यापन नहीं कर रहे है।
मुझे तो ऐसा लगता है प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह इन सब हड़ताली शिक्षकों को बर्खास्त कर दे। साथ ही एक महीने के अंदर बर्खास्त शिक्षकों के स्थान पर प्रदेश के योग्य बेरोजगारो को इनसे आधे वेतन पर नौकरी पर रख ले। इससे सरकार के खजाने पर से बोझ भी घटेगा, बेरोजगारी कम होगी व युवाओं को अपने हुनर दिखाने का मौका मिलेगा।
इस प्रदेश की जनता को ऐसे शिक्षक नहीं चाहिए जो सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए विद्यार्थियों व सरकार को ही मुसीबत मे डाल रहे हैं। अगर सरकार के आश्वासन व बच्चो की पढ़ाई मे हो रहे हर्जा को ध्यान मे रखकर शिक्षक हड़ताल बंद नहीं कर सकते तो हमें भी ऐसे स्वार्थी शिक्षक नहीं चाहिए।

अंकुर श्रीवास्तव, एमआईजी-20 हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, तिली रोड, सागर, मप्र
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गुड़िया

किसी बच्चे का इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या होगा कि दुनिया में आते ही उसकी मां परलोक सिधार जाए। गुड़िया भी कुछ ऐसी ही बदनसीब थी। आंखे खोलते ही उसे सबसे पहले अपनीं मां की मृत देह देखने मिली थी। पत्नी की मौत से महेश पूरी तरह टूट चुका था। एक तो पत्नी को खो देने का गम और उस पर नवजात बच्ची की देखभाल की जिम्मेदारी।
नन्हीं गुड़िया को नहलाना, धुलाना, बोतल से दूध पिलाना, इसी में उसका दिन बीत जाता। बच्ची को सुलाने की कोशिश में उसे रात-रात भर जागना पड़ता। इसी व्यस्तता के कारण उसकी खेती बाड़ी भी चौपट होती जा रही थी। महेश की यह हालत देख उसके रिश्तेदार और शुभ चिंतक उसे दूसरा विवाह कर लेने पर जोर दे रहे थे। बुजुर्ग समझाते कि अपने लिए न सही लेकिन बच्ची की खातिर उसे शादी कर लेना चाहिए।
अभी तो बच्ची छोटी है, कल जब सयानी होने लगेगी तब उसकी देखरेख के लिए मां का होना बहुत जरूरी है। काफी सोच विचार करने के बाद महेश दूसरी शादी करने के लिए राजी हो गया। दूर की रिश्तेदारी में एक सामान्य दर्जे की घरेलू युवती कमला से उसका मंदिर में से विवाह हुआ। सीधी-सादी पत्नी को पाकर महेश खुश था। कमला ने आते ही गृहस्थी और गुड़िया की सारी जिम्मेदारी संभाल ली।
महेश के परिवार की गाड़ी एक बार फिर जिंदगी की पटरी पर दौड़ने लगी। घर से निश्चिंत होते ही वह अपनी खेती किसानी पर पूरा ध्यान देने लगा। उसकी पहली पत्नी अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। लिहाजा ससुराल की पांच एकड़ जमीन महेश को ही मिली थी। उसके पड़ौसी गांव में ही वह जमीन थी। महेश यह देख कर प्रसन्न था कि कमला सगी मां की तरह गुड़िया को पाल रही है।
समय का पहिया अपनी रफ्तार से घूम रहा था। गुड़िया दो साल की हो रही थी। वह दिन भर घर में धमाचौकड़ी मचाती रहती। शादी के कुछ माह बाद ही कमला के पैर भारी हो गए। महेश उसका खूब ध्यान रखता। इस बार वह कोई चूक नहीं करना चाहता था। प्रसव के लिए वह कमला को शहर के एक बड़े निजी नर्सिंग होम ले गया।वहां कमला ने फूल से सुंदर पुत्र को जन्म दिया। अब तो महेश खुशी से फूला नहीं समा रहा था।
वह ऐसे प्रसन्न था जैसे उसे सारी दुनिया की दौलत मिल गई हो। कमला और महेश अपने बेटे को मुन्ना कहकर पुकारते। अब कमला का पूरा ध्यान अपने मुन्ना पर ही केन्द्रित रहता। वह गुड़िया के प्रति बिल्कुल बेपरवाह हो गई। गुड़िया उसे अनचाहा भार महसूस होने लगी। वह दिन भर लावारिस बच्चों की तरह इधर-उधर भटकती रहती।
गुड़िया अपने छोटे भाई मुन्ना को गोद में रख कर खूब दुलार करना चाहती, लेकिन कुसुम उसे भाई के पास फटकने तक नहीं देती। बात-बात पर उसे मां की दुत्कार झेलना पड़ती। महेश दिन भर खेत पर काम करके शाम को थका मांदा घर लौटता। वह घर के हालात से बिल्कुल अंजान था। मुन्ना की उम्र के साथ साथ कमला की गुड़िया के प्रति बेरूखी भी बढ़ती जा रही थी। महेश के घर पहुंचते ही कमला गुडिया की शिकायतें लेकर बैठ जाती। रोज-रोज शिकायतें सुन कर वह भी गुड़िया पर झुझलाने लगता। मां-बाप की झिड़कियों से गुड़िया सहम कर रह जाती।
कमला अब महेश को गांव छोड़ कर शहर में रहने की सलाह देने लगी। वह कहती कि गांव की जमीन कोई लेकर थोड़े ही भाग जाएगा। जमीन किसी को किराए पर दे देंगे। शहर में कोई नौकरी कर लेना। वहां बच्चों की पढ़ाई लिखाई भी बेहतर ढंग से हो सकेगी। जब बच्चों के बेहतर भविष्य की बात आई तो महेश शहर में रहने के लिए तैयार हो गया।
एक दिन शहर जाकर उसने किराए का मकान भी ले लिया। इधर गांव की जमीन १८ हजार रूपए सालाना ठेका पर देकर वह सपरिवार शहर आ गया। खुश किस्मती से उसे एक दुकान पर तीन हजार रूपए महीने की नौकरी भी मिल गई। नौकरी मिल जाने से उसका परिवार खुशहाल जिंदगी जीने लगा। अब गुड़िया तीन साल की हो चुकी थी। महेश ने कमला से उसका स्कूल में दाखिला कराने के लिए कहा।
कमला ने पास ही एक सरकारी प्रायमरी स्कूल में गुड़िया का नाम लिखवा दिया। परिवार में गुड़िया को छोड़ कर सभी के रहन-सहन में सुधार आ गया था। गुड़िया के साथ कमला का व्यवहार बद से बदतर होता जा रहा था। कई बार तो उसे भूखा ही स्कूल जाना पड़ता। उस पर ध्यान देने उसे नहान-धोने, खाने-पीने के लिए पूछने वाला घर में कोई नहीं था।
देखरेख के अभाव में गुड़िया का मन पढ़ाई-लिखाई में कम ही लगता। अपनी कक्षा की वह पढ़ने में सबसे कमजोर लड़की मानी जाने लगी। इस वजह से उसे स्कूल और घर में अक्सर फटकार लगाई जाती। यह गुड़िया की मासूमियत थी या वह दुनिया के इस व्यवहार की अभ्यस्त हो गई थी कि मां की मार और पिता की फटकार उसे ज्यादा विचलित नहीं करती।
तीज त्यौहार पर छोटे भाई को नए-नए कपड़े मिलते, लेकिन वह मुंह ताकती रहती। घर में पकवान बनते पर उसे खाने के लिए बचा खुचा ही मिलता। एक दिन स्कूल से आकर गुड़िया ने कमला को बताया कि उसके शिक्षक ने मम्मी-पापा को बुलाया है। दूसरे ही दिन कमला और महेश गुड़िया के साथ स्कूल पहुंच गए। स्कूल में शिक्षक ने गुड़िया की शिकायतों की झड़ी लगा दी।
महेश शिक्षक की बातें सुनकर जैसे जमीन में गढ़ा जा रहा है। स्कूल से बाहर निकलते ही कमला उस पर बरस पड़ी। देख ली अपनी लाड़ली की करतूत। अभी छोटी है तो मास्टर की बातें सुनना पड़ रही हैं। बड़ी होगी तो सारी दुनिया के सामने नीचा ना देखना पड़ेगा। तुम्हारे लाड़ ने इसे बिगाड़ कर रख दिया है। कमला के ताने महेश के मन में तीर की तरह लग रहे थे।
घर पहुंचते ही वह गुड़िया पर टूट पड़ा। उसने पहली बार गुड़िया पर हाथ उठाया था। पिता के तमाचों से गुड़िया का गोरा चेहरा लाल पड़ चुका था। वह एक कोने में दुबकी काफी देर तक सिसकती रही। कौन था जो उसके आंसू पौंछता। कमला ने कह दिया, आज इसे खाना नहीं दिया जाएगा। रात में सभी गहरी नींद में सो रहे थे लेकिन भूख के मारे गुड़िया की आंखों से नींद कोसो दूर थी।
गुड़िया समझ नहीं पा रही थी कि उसे किस गलती की सजा दी जा रही है। रोते-रोते उसे कब नींद आ गई,पता ही नहीं चला। सुबह होते ही मां की आवाज गुड़िया के कानों में पड़ी-महारानी अब स्कूल भी जाएगी या सोती ही रहेगी। वह हड़बड़ा कर बिस्तर से उठी, मुंह धोया और बस्ता उठा कर स्कूल के लिए चल दी। भूख के मारे उसके पैर नहीं उठ रहे थे। कुछ दूर ही चली थी कि चलना मुश्किल हो गया। वह सड़क किनारे एक चबूतरे पर बैठ गई। उसने देखा कि पास ही खड़ी उसी की उम्र की एक मैली-कुचैली लड़की राह चलते लोगों के आगे हाथ फैला कर पैसे मांग रही है। कुछ लोग उसके हाथ में सिक्के रखते जा रहे थे।
कुछ ही देर में उस लड़की की मुट्‌टी सिक्कों से भर गई। नन्ही गुड़िया को अभी अच्छे बुरे की समझ ही कहां थी। उसके बाल मस्तिष्क को यह तरकीब अच्छी लगी। उसने सोचा पैसे मिल जाएंगे तो बाजार में कुछ खरीद कर खा लेगी। गुड़िया भी उस लड़की की तरह राहगीरों के आगे हाथ फैलाकर पैसे मांगने लगी। उसकी मासूमियत देख कर लोग उसे पैसे देते जा रहे थे। संयोग से तभी महेश वहां से गुजरा।
वह घर से सब्जी खरीदने बाजार जा रहा था। गुड़िया को भीख मांगते देख उसे ऐसा लगा जैसे हजारों वाट का करंट उसके शरीर में दौड़ गया हो। वह जड़वत खड़ा गुड़िया को देख रहा था। अगले ही पल वह गुड़िया पर ऐसे झपटा जैसे बिल्ली चूहे के बच्चे पर झपटती है। गुड़िया को गोद में उठा कर वह घर की ओर भागा। घर पहुंचते ही उसने गुड़िया को एक कमरे में बंद कर दिया। महेश के हाथ पैर जैसे सुन्न हो गए थे।
वह निढाल होकर पलंग पर पसर गया। वह सोच नहीं पा रहा था कि यह क्या हो गया। कभी उसे गुड़िया पर गुस्सा आ रहा था तो कभी इस स्थिति के लिए खुद को जिम्मेदार मानकर पछतावा हो रहा था। जैसे सावन में आसमान पर बादल आते-जाते हैं, वैसे ही उसके मन में विचार आ-जा रहे थे। वह सोच रहा था कि जिसकी मां की जमीन की बदौलत उसका परिवार एशो आराम कर रहा है, वह लड़की भीख मांगने मजबूर है।
वह अपराध बोध से दबता जा रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि उससे बहुत बड़ा गुनाह हो गया है। इसकी सजा पता नहीं भगवान उसे किस रूप में देगा। यह सोच कर उसकी रूह कांप उठी। वह पलंग से उठा और उस कमरे पहुंचा, जहां गुड़िया थी।
पिता को देखते ही डर कर वह एक कोने में दुबक कर बैठ गई। उसकी मासूम आंखें मानो पिता से जीवनदान मांग रही थीं। वह कहने लगी पापा अब कभी गलती नहीं होगी। यह सुनते ही महेश ने उसे उठा कर सीने से लगा लिया। महेश फूट-फूट कर रो रहा था। गुड़िया उसे हैरत भरी नजरों से देखने लगी। महेश के आंसुओं से गुड़िया भीगती जा रही थी।
कृष्णकिशोर गौतम(संतोष) अगरियावाले, डा.अनिल तिवारी के पास , सागर(मप्र)
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